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Tuesday, March 29, 2016

पाश और मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट


सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से भर जाना,
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर 
और लौट कर घर जाना 
सबसे खतरनाक होता है 
हमारे सपनो का मर जाना

                           ~ पाश 


मैं इसे दस बार रिपीट कर सकता  हूँ,

करना चाहता भी हूँ. यही मेरी प्रेरणा हैं चलते रहने की , ना रुकने की. 

एक और नजरिया हैं - जो मुझे ज़्यादा  पसंद नहीं - 

वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन,

उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा हैं।  
(शानदार गाना हैं - चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनो)   

मेरी कहानी 
details  में जाए बिना कहानी यह हैं - लगभग दो साल पहले ३ लोगो की टीम थी मेरी software consulting की (मुझे नहीं लगता software के अलावा मुझे कुछ भी आता हैं :-) ). सब लोगो की ही तरह दो विकल्प थे जब मैने अपनी आखिरी नौकरी छोड़ी थी -consulting  या product building।  कहने की ज़रुरत नहीं की क्यों छोड़ी होगी।  वो रूमानी कीड़ा जो स्वयं और काम को हमेशा जोड़ कर देखता था ५-६ सालों से छट्पटा रहा था।  एक उम्मीद भरी छलांग ( leap of faith ) मारी थी मैंने.  उम्मीद  बहुत थी , प्लान गायब था।  कहीं न कहीं चीज़ें अपनी जगह फ़िट होती गईं और मैं ठीक ठाक करने लगा।  इतना ठीक कि तीन लोगो की एक टीम को १.५ साल तक रख लिया इन्हीं डेढ़ सालो में एक समय (करीब ६ महीने बाद ही) सोचा कि अब कुछ बनाया जाए - कुछ प्रोडक्ट जो कोई समस्या सोल्वे करें , दिमाग में ideas पहले  से थे पर refined नहीं थे। उस दिशा में थोड़ा काम किया तो एक दो ideas  पर प्रयास शुरू किया।  महा बकवास था अंजाम उस शुरु के सफर का।  मैं और एक टीम का मेंबर इस में शामिल थें।  बहुत चीज़े सीखीं पहले ३-४ महीने में , जिसमे हमने २ ideas को वापस ठन्डे बस्ते में डाल दिया। 



कहानी ड्रीम प्रोजेक्ट की। 
मैं पढता कम हूँ ,  बहुत पढ़ना शुरुं किया।  भेजा कंफ्यूज हो गया और मुझे लगा एकदम से दुनिया में सब बदल दूंगा मैं। 
कुछ और अकल आई एक दो हफ्ते में, (कुछ और पढ़ पढ़ के) - और मैंने एक प्रॉब्लम नोटिस की जो सुलझाई जा सकती थी , लेकिन बहुत आसान प्रोजेक्ट नहीं था यह। 
मैं ज़िद सी पे अड़ गया था , वहाँ से आगे बढ़ के दो तीन और  आइडियाज पे वेलिडेशन किया , मगर मेरा ध्यान वहीँ अटका हुआ था। जुलाई २०१४ में मैं पिता बना इक लक्ष्मी का, और इसको शुभ संकेत मान कर मैंने वही अटके हुए whiteboard  पर लौटने का विचार बनाया। मेरी टीम ने मेरा समर्थन किया।  जिससे हौसला बढ़ा। मैं इसे अपना ड्रीम प्रोजेक्ट मानता हूँ। 
मैंने करीब १० साल  IT industry  में।  कुछ अच्छे , कुछ वाहियाद projects  पे काम किया।  मगर इतना ambitious /महत्वकांशी system बनाने में कभी शामिल नहीं था। 
मुझे शुरुआत से मालूम था , यात्रा आसान नहीं होने वाली (जो अभी भी जारी हैं)

हाँ मैं यह भी सुन चूका हूँ कि MVP ३ महीने में आ जाना चाहिए मार्किट में और हमको कुछ १ साल लगा :-( .
एक स्वचालित / bootstrapped सेटअप में काम करने के अपने फायदे और नुक्सान होते हैं , एक कंसल्टिंग + product  बिल्डिंग के भी।  हमने दोनों देखे हैं।  कभी अफ़सोस भी हुआ।  फिर कुछ अच्छी ख़बरें मिलती हैं तो ख़ुशी होती हैं जैसे (housing और tinyowl  की :-P ) 

Point क्या हैं ?
सपना होना चाहिए आपका काम , यही पाश ने मुझे सिखाया अपने लेखन से। बाकी मैं उनकी क्रांतिकारी जीवन पे टिप्पणी  नहीं करता। 

मगर सपना हैं मेरा ये project . और सपना होना चाहिए आपका हर project . और उस सपने को टूटने से बचाने की ऊर्जा आपमें स्वयं आ जाएगी। मुझमे हैं।  आप खुद रास्ते निकाल लेंगे जो भी ज़रूरी हैं वो करने के लिए , उस सपने को बचाने के लिए। 



अगर किसी ने यहाँ तक पढ़ा हैं तो शुक्रिया , आप में हैं कुछ स्पेशल , क्यूंकि लोग कहते नहीं मगर मैं बहुत बढा चाट हूँ  . :-)

आप सीरियसली deserve करते  हैं कुछ स्पेशल


तो ये लीजिए - फ्री फ्री फ्री। ..










Monday, March 26, 2012

Murjhaye sapne

Kuch Murjhaye sapne,
Kuch sookhe aansu,
kuch jaagi raate,
kuch kadwe sach,
sab baandhe hai ek thaile me, jo bahut bhaari ho chala hai, kabhi bhi fatt sakta hai,

Kuch purze bhi hai rakhhe, ik aaena ban sakta hai jinhe jod kar,
Magar himmat itni nahi ab, fas-e-aaena jo dikkhe, uska saamna kar sake,
So, jaisa hai waisa rehne dete hai,
Isi ko behtar maan kar,

Kuch aarzuuen bhi hai rakkhi,
Inhe poora karenge, socha hai, waqt saath dega to,
Na bhi ho to unki koshish ka hi jashn manaenge zaroor,
Jazba hai kaafi ho to behtar hai,