Monday, March 28, 2016

माली


  1. बगीचो की कोई कमी नहीं मुल्क में , माली मगर नहीं मिलते . 
कभी चिड़ियाँ नहीं मिलती , कभी शज़र नहीं मिलते । 
हैं एक ही कोई ऊपर, यक़ीं आएँ जहाँ, ऐसे उसके घर नहीं मिलते

Saturday, March 26, 2016

दरया

हम उस छोर की राह देखतें,
कब दरया हो चले , पता ना चला,
याद आता रहा वो किनारा मुझे,
लहरों से जो दूर जाता रहा।   

डर

भीड़ से भी डरता हूँ,
तन्हाई से घबराता हूँ,
बर्फ़ से जलता हूँ,
आतिश से भी जम सा जाता हूँ,

अब यह  मैं जानता कि ,
क्या मैं उस को चाहता हूँ ,
मैं जीना तो बहुत चाहता हूँ ,
बस दुनिया से डर जाता हूँ,

मौत बुज़दिल ही बुलाया करते हैं अपनी,
उसको तो मैं ठुकराता हूँ ,
बस इसी इक बात से बहादुर कहलाता हूँ,

हाँ हसता तो अब भी हूँ लेकिन,
 मगर रोने के बहाने ज़्यादा पाता हूँ ,

अक्सर अकेले में यूँ ही कुछ लिख जाता हूँ ,
पढ़ के बाद में समझ ना पाता हूँ,
शायद ऐसे ही चलते रहना देना
सच्चाई से किसी घबराता हूँ ,
सच्चाई से किसी घबराता हूँ। 

मौसम

 अब इस बारिश में वो नमी नहीं, वो सुकून नहीं ,
आपके जाने का बादल पे भी गहरा असर हुआ लगता हैं। 

Friday, March 25, 2016

मेरा सुन्दर सपना


चार प्लेट भटूरे हो या एक प्लेट कचौरीं,
दिल भर के खाते थे, पेट भरे, ना भरे,
अब कैलोरीयो का मीटर चलता हैं हर निवाले पर,
दिल साला भरता ही नहीं कभी,
लगता है पेट की बारी बड़ी जल्दी आ जाती है अब,
मेरी भूख-प्यास सब लूट गया,
मेरा सुन्दर सपना टूट गया,

एक रिक्शा और एक दोपहर में,
घर बदल लेते थे,
अब एक ट्रक और एक वीकेंड लग जाता है,
पर मकान ही बदल पाते हैं,
घर अब मिलता नहीं ,
दूर कहीं छूट गया,
मेरा सुन्दर सपना टूट गया,

आज वो चौराहे का पत्थर,
मुझे आवारा कहता हैं,
ये बांवरी हवा ही  अब बस मुझ सी दिखती हैं,
यही मेरे ख्वाब सुहाने,
ले कुछ बादलों के संग मुझ पर बरसाती हैं,
वक्त मेरा बाकी सब कुछ लूट गया
मेरा सुन्दर सपना टूट गया,   

Thursday, March 24, 2016

बबलगम और स्टिकरों वाला बचपन

बारह आने के चार ,
हर बबल गम के साथ एक करोड़ रुपैय्ये की गाड़ियों के स्टिकर,
पता नहीं स्टिकर के चक्कर में कितने चिल्लर खा गया,
दांत सड़ गए , बचपन बन गया,

लॉजिकली बेवकूफी हैं ,
पर अच्छा हैं मैंने यह बेवकूफियां की,

मैंने दिल की बात सुनना छोड़ दिया था,
बस वही इक भूल हो गयी थी ,
कुछ १० साल लगे सुधरने में ,

कुछ भारी भरकम फिल्में देख देख कर ,
कुछ फिलोसोफिकल किताबें पढ़ पढ़ कर वो सीधी साधी सरल बातें याद आईं ,

बचपन बस यादों में बस कर ठेंगा दिखता है अब लेकिन,
बस यादों में



Wednesday, March 23, 2016

उलझन

मेरी तेरी ख्वाहिन्शों की गांठें,
कितनी आसानी से लग गयीं थी ?
खुलते वक़्त, जान जा रहीं हैं,
जाने क्या क्या साथ बाँध बैठा था