Saturday, March 26, 2016

डर

भीड़ से भी डरता हूँ,
तन्हाई से घबराता हूँ,
बर्फ़ से जलता हूँ,
आतिश से भी जम सा जाता हूँ,

अब यह  मैं जानता कि ,
क्या मैं उस को चाहता हूँ ,
मैं जीना तो बहुत चाहता हूँ ,
बस दुनिया से डर जाता हूँ,

मौत बुज़दिल ही बुलाया करते हैं अपनी,
उसको तो मैं ठुकराता हूँ ,
बस इसी इक बात से बहादुर कहलाता हूँ,

हाँ हसता तो अब भी हूँ लेकिन,
 मगर रोने के बहाने ज़्यादा पाता हूँ ,

अक्सर अकेले में यूँ ही कुछ लिख जाता हूँ ,
पढ़ के बाद में समझ ना पाता हूँ,
शायद ऐसे ही चलते रहना देना
सच्चाई से किसी घबराता हूँ ,
सच्चाई से किसी घबराता हूँ। 

मौसम

 अब इस बारिश में वो नमी नहीं, वो सुकून नहीं ,
आपके जाने का बादल पे भी गहरा असर हुआ लगता हैं। 

Friday, March 25, 2016

मेरा सुन्दर सपना


चार प्लेट भटूरे हो या एक प्लेट कचौरीं,
दिल भर के खाते थे, पेट भरे, ना भरे,
अब कैलोरीयो का मीटर चलता हैं हर निवाले पर,
दिल साला भरता ही नहीं कभी,
लगता है पेट की बारी बड़ी जल्दी आ जाती है अब,
मेरी भूख-प्यास सब लूट गया,
मेरा सुन्दर सपना टूट गया,

एक रिक्शा और एक दोपहर में,
घर बदल लेते थे,
अब एक ट्रक और एक वीकेंड लग जाता है,
पर मकान ही बदल पाते हैं,
घर अब मिलता नहीं ,
दूर कहीं छूट गया,
मेरा सुन्दर सपना टूट गया,

आज वो चौराहे का पत्थर,
मुझे आवारा कहता हैं,
ये बांवरी हवा ही  अब बस मुझ सी दिखती हैं,
यही मेरे ख्वाब सुहाने,
ले कुछ बादलों के संग मुझ पर बरसाती हैं,
वक्त मेरा बाकी सब कुछ लूट गया
मेरा सुन्दर सपना टूट गया,   

Thursday, March 24, 2016

बबलगम और स्टिकरों वाला बचपन

बारह आने के चार ,
हर बबल गम के साथ एक करोड़ रुपैय्ये की गाड़ियों के स्टिकर,
पता नहीं स्टिकर के चक्कर में कितने चिल्लर खा गया,
दांत सड़ गए , बचपन बन गया,

लॉजिकली बेवकूफी हैं ,
पर अच्छा हैं मैंने यह बेवकूफियां की,

मैंने दिल की बात सुनना छोड़ दिया था,
बस वही इक भूल हो गयी थी ,
कुछ १० साल लगे सुधरने में ,

कुछ भारी भरकम फिल्में देख देख कर ,
कुछ फिलोसोफिकल किताबें पढ़ पढ़ कर वो सीधी साधी सरल बातें याद आईं ,

बचपन बस यादों में बस कर ठेंगा दिखता है अब लेकिन,
बस यादों में



Wednesday, March 23, 2016

उलझन

मेरी तेरी ख्वाहिन्शों की गांठें,
कितनी आसानी से लग गयीं थी ?
खुलते वक़्त, जान जा रहीं हैं,
जाने क्या क्या साथ बाँध बैठा था 

Saturday, April 7, 2012

कल और आज


एक साधारण सा कल , आज क्यां तुमको भी जन्नत लगता हैं ,क्यां तुमको भी अंजानी राह पे चलता बंजारा , जाना-पहचाना सा लगता हैं ,तुम भी रोते से हो क्यां, किसी बच्छे की स्कूल बस छूटते देख के,क्यां तुमको भी उस मासूम की चमकती किस्मत से ईरश्या का अनुभव सा होता हैं,




समोसे की इक छोटी सी दुकान,
बैठा करते जहां कभी दो , कभी चार ,
देता था साथ समोसे के , धनिया-मिर्ची की लाजवाब चटनी ,
कितना कोसा करते थें चटनी को तुम,
फिरकी लेते थे दुकान वाले से  -
"क्या भैय्या मिर्ची उगा रहें हो क्या आज कल"
वो भी मुस्कुरा देता था बस,
समझता था , मसखरे सारे हैं आते बस,
दोस्त था तुम्हारा , केवल सौदागर नहीं,
कई बार उसी ने बचाई जान थी,
जब पापा का स्कूटर तुमने भिड़ाया था,
 और खूब बनवाई का खर्चा आया था,
जाने कितनी शामें गुजारीं ऐसे ,


अब याद तुमको भी नहीं क्यां कुछ ऐसी ही यादें,
वो धनिये की चटनी,
समोसे की प्लेट,
क्लच वाॅयर का रेट,
वो दोस्त.
उससे मिलते तो होगे ना तुम,
नाम तो याद होगा ना उस दोस्त का,
या मेरी ही तरह  .... तुम भी



रात दिन

रात दिन जल्दी होने लगे आज कल,
दिन के भी मक़सद होने लगे शायद आज कल,
लोगो का नजरियां भी सोचने लगे है आज कल,
इसे पागलों की आदत कहा करते थे कल तक।